होली रंग-बिरंगी रंगों का त्यौहार,
यह कैसी मस्ती है, कैसी है बहार।
हर कोई बस खुश होना चाहता है,
हर कोई बस बहक जाना चाहता है।
हर फिक्र, हर ग़म को भुलाना चाहता है,
दिल हर एक को गले लगाने की धुन में,
खुद ही उसके रंग में रंग जाना चाहता है।
कोई दूर से देख रहा है यह मस्ती,
कोई बाहें फैलाकर खो रहा है खुद की ही हस्ती।
कोई अपनी ही मस्ती में खोया,
थोड़ी और ढूंढ रहा है मस्ती।
यूं तो कई कारण हैं इतिहास में,
इस त्यौहार के बहार के,
इकरार के, इनकार के, इंतजार के।
पर सबसे बड़ा कारण,
नफरत पर जीत है, प्यार की।
आओ रंग लें प्यार के रंगों में,
तोड़कर थोड़ी देर अहम की कुंडियां,
सतरंगी कुंडों में,
खुलकर लगा लें डुबकियां।
मतवाली संगिनी, पिया संग आज खेले होली है,
ना “तू” रहा, ना “मैं” रहा।
एक होने के इस त्यौहार में,
सब टोलियां एक-दूजे की हो ली हैं।
अतरंगी त्योहार होली,
तो बस होली है!