आकाशगंगा

जा आकाशगंगा लिया मेरी दादी कहती थी।
विस्मित अचंभित मैं उन्हें देखती ,
“हां ,जा बरसात का पानी परात में भरकर ले आ”।
“ठाकुर जी को आज आकाश गंगा से नवाहआएंगे।”

कुछ समझ नहीं पहली बार आया ,
पर गंगा के बाद आकाशगंगा पहली बार उनके ही स्वर में
पाया।

शब्द का असर मेरे मस्तक में उम्र भर रहा ।
मां गंगा और आकाशगंगा दोनों को स्मरण किया।

अलग ही कहानी है मां गंगा की शिव शीर्ष से सारी जगत को तारने की ,
खारे सागर से
मीठे जल के मिल जाने की,
एक-एक बूंद को
उससे अलग करने की,
ब्रह्मचारिणी शक्ति स्वरूपा
बादलों में फिर सिमट जाने की।
विष्णु शक्ति उनके चरणों से निकल, स्वर्ग से आने की,
शिव शक्ति बन
शिव शीश से उतर, जगत का उद्धार करने
की,
पापियों का नहीं, उनके पापों का संहार करने की।


गंगा। आकाश गंगा।
360 डिग्री तक का सफर तय करती हैं वैज्ञानिक इतनी मुझको हतपृद करती है ।
कभी कह नहीं पाई क्योंकि अनुभवों का लंबा सफर रहा। जीवन भी आकाशगंगा से गंगा का,
सफर तय करता रहा।
अब जाना,
यह चक्र है जीवन का,
जो नियत है।
हम कहां हैं,
यह वही जाने जो चेतन है।

मां हमारा उद्धार करो,
इस धरती पर,
इस भवसागर में,
हमको भी प्यार करो।

जय मां गंगा ।
जय मां आकाशगंगा।

- Sangam insight

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