अब मेरी हसरतों ने दम तोड़ा,
कहा नींव के पत्थरों ने खुद से।
चाहत मेरी भी थी बुलंदी का हिस्सा बनने की,
पर किस्मत ने किसके साथ जोड़ा।
अब मेरी हसरतों ने दम तोड़ा,
कहा नींव के पत्थरों ने खुद से।
क्या मेरे ख्वाबों को कुछ भी कहने की इजाजत नहीं?
क्या नींव के पत्थरों की अपनी कोई चाहत नहीं?
ऊपर-ऊपर से देखने वालों, तुम क्या जानो नींव के पत्थरों का दर्द,
उनका तो कहीं कोई जिक्र ही नहीं।
क्या मेरे ख्वाबों को कुछ भी कहने की इजाजत नहीं?
अब मेरी हसरतों ने दम तोड़ा,
कहा नींव के पत्थरों ने खुद से।
क्या दर्द नहीं होता हमारे सीने में?
क्या झेलते नहीं वजन तुम्हारा अपने सीने में?
ओ बुलंदियों से आसमान छूने वालों,
तुम क्या जानो हमारा दर्द।
हम तो न जीने में हैं, न मरने में।
किसी को हमारी याद नहीं,
किसी को फुर्सत नहीं हमारे जिक्र की।
किसी को भला क्या गम हो हमारा,
क्या कहें जब अपनों ने भी साथ छोड़ा।
अब मेरी हसरतों ने दम तोड़ा,
कहा नींव के पत्थरों ने खुद से।
साथ-साथ बड़े थे, साथ-साथ तपे थे,
पर साथ-साथ न चले थे।
यहीं पर हम तुमसे जुदा हो चले थे।
किस्मत की सारी कहानी है,
तुम कहीं चले बुलंदी को छूने,
कोई मुझे ले चला यह कहकर
कि घर की नींव भरानी है।
खड़े हो तुम अपनी शान में,
और गड़े हैं अभी तक हम जमीन में।
अधर में लटक ही जाते तुम,
जो न होते हम आधार में।
जो तुम इठलाकर कह रहे हो
कि रहो अपनी जगह पर,
तो हां, मंजूर है साथ ज़मीं का।
हम तो न हिले, न डुले, न मुंह मोड़ा,
ना कभी अपना वादा तोड़ा।
पर तेरी बेरुख़ी देख,
अब मेरी हसरतों ने दम तोड़ा।
अब हसरतों ने दम तोड़ा,
कहा नींव के पत्थरों ने खुद से।