*”तुम कितनी संवेदनशील हो”*
जब तुमने मुझसे यह कहा,
और
तुम कितने पाषाण हो, मेरे ह्रदय से निकला।
मैंने यह संवेदनशीलता क्या किसी किताब से सीखी है
या यह किसी गुरुत्वाकर्षण का नतीजा है?
यह मैंने खुद से भी पूछा था।
नहीं, नहीं, यह खुदा की नियामत है मुझ पर,
सीधा रास्ता है उनका मेरे दिल तक।
आत्मा का आईना है संवेदनशीलता,
यही बताती है
कौन हार कर भी जीता।
यही हौसलों को
पंख लगाती है,
यही उड़ाती है आसमानों में।
संवेदनशीलता स्वर्ग की सैर कराए,
संवेदनशील इंसान ही
इंसान कहलाए।
संवेदनशीलता इंसान में इंसानियत का सृजन करती है,
मां की कोख से निकले जीव में आत्मा का प्रजनन करती है।
जीव को शिव तक
जोड़ती है,
अहम् के हर बंधन को तोड़ती है।
संवेदनशील ना हो तो,
खुद की खुद के द्वारा मृत्यु निश्चित है,
जैसे घड़ी में जाता समय अभिव्यक्त है।
मैं कहूं,
तुम अजर-अमर हो जाओ,
बस थोड़ा सा संवेदनशील बन जाओ।