शिव को मनाऐ जब सारी नगरी
तब मेरी आस क्यों रह जाए अधूरी ?
पर कैसे मनाऊं मैं भोलेनाथ को ?
जो रूठे न कभी किसी से
तो क्यों रिझाऊं सरकार को?
सगुण रूप को त्याग कर एक ओंकार में आकर लिया,
पर मनाने को न जाने कितनी विधियों को शास्त्रों ने तैयार किया।
जिस पर ठहरता नहीं एक बूंद जल भी
उस पर न जाने कितने पदार्थों से वार किया।
न जाने क्या-क्या ना चढ़ा दिया भोले पर ,
पर खुद के समर्पण के लिए
खुद को ना तैयार किया।
यह कैसा खेल है माया का?
जो लुभाने में लगा है ,
उस मन को,
जो एक पल भी नेत्र ना खोले,
बस जपे राम ही राम केवल को।
क्या पदार्थों से शिव रीझ जाएंगे ?
क्या लकीरों को पीटने से खीझ न जाएंगे?
सिर्फ एक दिन सिर्फ एक दिन
शिव की रात है आती
पर उस दिन भी ओ जीव तुझमें भोले की भोली सीरत न समाती।
देख सिर्फ देख मंगलमय रूप को आत्मसात कर त्रिनेत्र धारी अवधूत को ।
जटा से से लेकर बाघअबंर तक सब तेरी कहानी है ,
गंगा है तेरे लिए,
अमृतमय इसकी रवानी है,
सर्वज्ञ सर्व सम्मानित सर्वस्व होते हुए भी शिव कितना निरा अभिमानी है,
निराकार ओंमकार लिंग में परिवर्तित होकर बना महादानी है।
बस एक बार निहार ले,
इस सुंदरतम आईने में,
तू अपनी सूरत।
तुझे अपना पता मिल जाएगा,
तेरा शिवोहम
तुझ में स्वयं प्रकट हो जाएगा।
एक दिन बस एक दिन
तू यह साधना कर ले
शिव की रात्रि में शिवत्व प्रकट कर ले,
तेरी साधना आराधना में बदल जाएगी निर्गुण निराकार ओंमकार को जपते जपते तेरी हर राह सुगम से सुगम तर हो जाएगी,हर राह सुगम तर हो जाएगी।
ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय